Shrimad Bhagwat Gita Aarti श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने वाली भक्तिमय आरती है। श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद के माध्यम से धर्म, कर्म, ज्ञान, भक्ति और जीवन के विभिन्न प्रश्नों पर विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
इस लेख में आपको Shrimad Bhagwat Gita Aarti Lyrics in Hindi, श्रीमद्भगवद्गीता आरती के संपूर्ण बोल, आरती का भक्तिमय महत्व और इससे जुड़ी सामान्य जानकारी सरल भाषा में मिलेगी।
श्रीमद्भगवद्गीता का भक्तिमय महत्व
श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का एक महत्वपूर्ण भाग है। इसमें भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद प्रस्तुत किया गया है।
गीता के विभिन्न अध्यायों में कर्म, ज्ञान, भक्ति, आत्मा, कर्तव्य और जीवन के अनेक दार्शनिक विषयों पर चर्चा की गई है।
भक्त और पाठक अपनी धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपरा के अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन और पाठ करते हैं। गीता की आरती के माध्यम से भक्त इस पवित्र ग्रंथ और उसमें निहित शिक्षाओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
Shrimad Bhagwat Gita Aarti कब करें?
भक्त अपनी धार्मिक और पारिवारिक परंपरा के अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता की आरती कर सकते हैं।
सामान्य रूप से इसे निम्न अवसरों पर श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है:
- श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ के बाद
- दैनिक पूजा के समय
- गीता जयंती के अवसर पर
- धार्मिक अध्ययन या सत्संग के दौरान
- घर में होने वाले भजन और कीर्तन के समय
- विशेष धार्मिक अवसरों पर
पूजा और आरती की विधि परिवार, क्षेत्र और धार्मिक परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
श्रीमद्भगवद्गीता की आरती
जय भगवद्गीते,
जय भगवद्गीते।
हरि-हिय-कमल-विहारिणि,
सुन्दर सुपुनीते॥
कर्म-सुमर्म-प्रकाशिनि,
कामासक्ति-हरा।
तत्त्वज्ञान-विकाशिनि,
विद्या ब्रह्म-परा॥
निश्चल-भक्ति-विधायिनि,
निर्मल मलहारी।
शरण-रहस्य-प्रदर्शिनि,
सर्व-विधि सुखकारी॥
राग-द्वेष-विदारिणि,
कारिणि मोद सदा।
भव-भय-हारिणि,
तारिणि परमानंददा॥
आसुर-भाव-विनाशिनि,
नाशिनि तम-रजनी।
दैवी सद्गुण-दायिनि,
हरि-रसिका सजनी॥
समता-त्याग सिखावनि,
हरि-मुख की वाणी।
सकल शास्त्र की स्वामिनी,
श्रुतियों की रानी॥
दया-सुधा बरसावनि,
मातः! कृपा कीजै।
हरिपद-प्रेम दान कर,
अपना भक्त कीजै॥
॥ जय भगवद्गीते ॥
॥ श्रीमद्भगवद्गीता माता की जय ॥
आरती के शब्दों का भक्तिमय भाव
कर्म और कर्तव्य का स्मरण
श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म और कर्तव्य से जुड़े विषयों का विशेष स्थान है। आरती में भी भक्त गीता की शिक्षाओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है।
भक्तिमय दृष्टि से यह भाव व्यक्ति को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देता है।
ज्ञान और विवेक का महत्व
गीता के अध्ययन को अनेक लोग आत्मचिंतन और ज्ञान से जोड़कर देखते हैं। आरती में ज्ञान और विवेक के विकास की भावना व्यक्त की जाती है।
भक्ति और समर्पण
आरती के शब्दों में भगवान के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव दिखाई देता है। भक्ति परंपरा में सच्चे भाव और विनम्रता को विशेष महत्व दिया जाता है।
राग और द्वेष से ऊपर उठने का भाव
आरती में राग-द्वेष से मुक्त होने और मन में सकारात्मकता बनाए रखने का भक्तिमय संदेश मिलता है। इसे आत्मचिंतन और मानसिक संतुलन के भाव से भी जोड़ा जा सकता है।
श्रीमद्भगवद्गीता की आरती कैसे करें?
आरती और पूजा की विधि परिवार तथा धार्मिक परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
सामान्य रूप से भक्त निम्न प्रकार से आरती कर सकते हैं:
- पूजा या अध्ययन का स्थान स्वच्छ रखें।
- श्रद्धापूर्वक श्रीमद्भगवद्गीता का स्मरण करें।
- अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार दीपक या पूजा सामग्री तैयार करें।
- शांत और एकाग्र मन से गीता का पाठ या अध्ययन करें।
- इसके बाद श्रद्धा के साथ गीता आरती का पाठ या गायन करें।
- आरती पूर्ण होने पर श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें।
यदि आप किसी विशेष संप्रदाय, मंदिर या पारिवारिक परंपरा का पालन करते हैं, तो उसी परंपरा को प्राथमिकता देना उचित है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्ययन का सामान्य संदेश
श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन अलग-अलग धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जाता है।
इसमें कर्तव्य, कर्म, ज्ञान, भक्ति और आत्मचिंतन जैसे विषयों पर विचार किया गया है। पाठक गीता के अध्ययन के माध्यम से अपने जीवन और कर्तव्यों पर विचार कर सकते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। विभिन्न विद्वानों और परंपराओं द्वारा इसके अलग-अलग भाष्य और अनुवाद प्रस्तुत किए गए हैं।
आरती के बाद क्या करें?
आरती पूर्ण होने के बाद भक्त श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर सकते हैं।
इसके बाद कुछ समय शांत मन से बैठकर गीता की शिक्षाओं और अपने जीवन के कर्तव्यों पर विचार किया जा सकता है।
आप सरल भाव से इस प्रकार प्रार्थना कर सकते हैं:
हे प्रभु, हमें सत्य, कर्तव्य और सद्भाव के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें। हमारे मन में ज्ञान, विनम्रता और सकारात्मकता का भाव बनाए रखें।
इसके बाद अपनी धार्मिक और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा पूर्ण की जा सकती है।
Shrimad Bhagwat Gita Aarti से जुड़े सामान्य प्रश्न
श्रीमद्भगवद्गीता की आरती किससे संबंधित है?
यह आरती श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने वाली भक्तिमय आरती है।
श्रीमद्भगवद्गीता की आरती कब की जा सकती है?
भक्त अपनी धार्मिक और पारिवारिक परंपरा के अनुसार गीता पाठ, दैनिक पूजा, सत्संग या गीता जयंती जैसे अवसरों पर आरती कर सकते हैं।
क्या श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन घर पर किया जा सकता है?
हाँ, अनेक लोग अपनी धार्मिक और व्यक्तिगत परंपरा के अनुसार घर पर श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन और पाठ करते हैं।
क्या गीता के अलग-अलग अनुवाद उपलब्ध हैं?
हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के संस्कृत मूल पाठ के साथ विभिन्न भाषाओं में अनेक अनुवाद और भाष्य उपलब्ध हैं।
आरती के बाद क्या करना चाहिए?
आरती के बाद श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके कुछ समय शांत मन से गीता की शिक्षाओं का चिंतन किया जा सकता है।
निष्कर्ष
Shrimad Bhagwat Gita Aarti श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का एक भक्तिमय माध्यम है।
गीता भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें कर्म, ज्ञान, भक्ति और कर्तव्य जैसे विषयों पर विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
भक्त अपनी धार्मिक और पारिवारिक परंपरा के अनुसार गीता का अध्ययन, पाठ और आरती कर सकते हैं। भक्ति में श्रद्धा, विनम्रता और आत्मचिंतन का विशेष महत्व माना जाता है।
॥ जय श्री कृष्ण ॥
॥ जय भगवद्गीते ॥
॥ श्रीमद्भगवद्गीता माता की जय ॥
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External Reference
श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोक और विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत अनुवाद देखने के लिए IIT Kanpur के Gita Supersite का अध्ययन किया जा सकता है।
॥ जय श्री कृष्ण ॥
॥ जय भगवद्गीते ॥



