Shri Siddhivinayak Aarti – Sukhkarta Dukhharta | श्री सिद्धिविनायक आरती

Shri Siddhivinayak Aarti Sukhkarta Dukhharta – श्री सिद्धिविनायक आरती

श्री सिद्धिविनायक आरती “सुखकर्ता दुःखहर्ता” भगवान श्री गणेश को समर्पित एक प्रसिद्ध मराठी आरती है। इसमें भगवान गणेश के मंगलकारी, विघ्नहर्ता और भक्तों के कल्याणकारी स्वरूप का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। गणेश आराधना भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में विशेष स्थान रखती है।

“सुखकर्ता दुःखहर्ता” आरती का पाठ भक्तजन भगवान गणेश की पूजा, आरती और विभिन्न धार्मिक अवसरों पर अपनी श्रद्धा के अनुसार करते हैं। आरती में भगवान गणेश से सुख, शांति, सद्बुद्धि और जीवन में आने वाली बाधाओं से मार्गदर्शन की प्रार्थना का भाव मिलता है।

इस पृष्ठ पर Shri Siddhivinayak Aarti – Sukhkarta Dukhharta के बोल सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किए जाएंगे, ताकि श्रद्धालु इसे आसानी से पढ़ सकें और अपनी पूजा में शामिल कर सकें।

धार्मिक आरती और पूजा भारतीय आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके पाठ और पूजा-विधि अलग-अलग परिवारों, मंदिरों और क्षेत्रों की परंपराओं के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।

गणपति बप्पा मोरया।

श्री सिद्धिविनायक आरती

सुखकर्ता दुःखहर्ता, वार्ता विघ्नाची।
नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥
जय देव जय देव॥

जय देव जय देव,
जय मंगलमूर्ति।
दर्शनमात्रे मनःकामना पूर्ति।
जय देव जय देव॥

रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुमकुम केशरा।
हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥
जय देव जय देव॥

जय देव जय देव,
जय मंगलमूर्ति।
दर्शनमात्रे मनःकामना पूर्ति।
जय देव जय देव॥

लंबोदर पीतांबर फणिवर वंदना।
सरळ सोंड वक्रतुंडा त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकष्टी पावावे निर्वाणी, रक्षावे सुरवर वंदना॥
जय देव जय देव॥

जय देव जय देव,
जय मंगलमूर्ति।
दर्शनमात्रे मनःकामना पूर्ति।
जय देव जय देव॥

॥ श्री गणेशाची आरती ॥

शेंदूर लाल चढायो अच्छा गजमुखको।
दोंदिल लाल बिराजे सुत गौरिहरको।
हाथ लिए गुड़ लड्डू सांई सुरवरको।
महिमा कहे न जाय, लागत हूँ पादको॥
जय देव जय देव॥

जय देव जय देव,
जय जय श्री गणराज।
विद्या सुखदाता,
धन्य तुम्हारा दर्शन,
मेरा मन रमता।
जय देव जय देव॥

अष्टौ सिद्धि दासी, संकट को बैरी।
विघ्नविनाशन मंगलमूर्ति अधिकारी।
कोटिसूर्यप्रकाश, ऐसी छवि तेरी।
गंडस्थल मदमस्तक झूले शशिबिहारी॥
जय देव जय देव॥

जय देव जय देव,
जय जय श्री गणराज।
विद्या सुखदाता,
धन्य तुम्हारा दर्शन,
मेरा मन रमता।
जय देव जय देव॥

भाव-भक्त से कोई शरणागत आवे।
संतत संपत्ति सब ही भरपूर पावे।
ऐसे तुम महाराज, मोको अति भावे।
गोसावीनंदन निशिदिन गुण गावे॥
जय देव जय देव॥

जय देव जय देव,
जय जय श्री गणराज।
विद्या सुखदाता,
धन्य तुम्हारा दर्शन,
मेरा मन रमता।
जय देव जय देव॥

॥ श्री शंकराची आरती ॥

लवथवती विक्राळा, ब्रह्मांडी माळा।
विषे कंठ काळा, त्रिनेत्री ज्वाळा।
लावण्य सुंदर मस्तकी बाळा।
तेथुनिया जळ निर्मळ वाहे झुळझुळा॥
जय देव जय देव॥

जय देव जय देव,
जय श्रीशंकरा।
आरती ओवाळू,
तुज कर्पूरगौरा।
जय देव जय देव॥

कर्पूरगौरा भोळा, नयनी विशाळा।
अर्धांगी पार्वती, सुमनांच्या माळा।
विभूतीचे उधळण, शितिकंठ नीळा।
ऐसा शंकर शोभे, उमा वेल्हाळा॥
जय देव जय देव॥

जय देव जय देव,
जय श्रीशंकरा।
आरती ओवाळू,
तुज कर्पूरगौरा।
जय देव जय देव॥

देवी दैत्यी सागरमंथन पै केले।
त्यामाजी अवचित हळहळ जे उठले।
ते त्वां असुरपणे प्राशन केले।
नीलकंठ नाम प्रसिद्ध झाले॥
जय देव जय देव॥

जय देव जय देव,
जय श्रीशंकरा।
आरती ओवाळू,
तुज कर्पूरगौरा।
जय देव जय देव॥

व्याघ्रांबर फणिवरधर, सुंदर मदनारी।
पंचानन मनमोहन, मुनिजनसुखकारी।
शतकोटीचे बीज वाचे उच्चारी।
रघुकुलटिळक रामदासा अंतरी॥
जय देव जय देव॥

जय देव जय देव,
जय श्रीशंकरा।
आरती ओवाळू,
तुज कर्पूरगौरा।
जय देव जय देव॥

॥ श्री देवीची आरती ॥

दुर्गे दुर्घट भारी, तुजविण संसारी।
अनाथनाथे अंबे, करुणा विस्तारी।
वारी वारी जन्ममरणाते वारी।
हारी पडलो आता, संकट नीवारी॥
जय देवी जय देवी॥

जय देवी जय देवी,
जय महिषासुरमथनी।
सुरवर-ईश्वर-वरदे,
तारक संजीवनी।
जय देवी जय देवी॥

त्रिभुवनी भुवनी पाहतां तुज ऐसे नाही।
चारी श्रमले, परंतु न बोलावे काही।
साही विवाद करितां पडिले प्रवाही।
ते तू भक्तालागी पावसि लवलाही॥
जय देवी जय देवी॥

जय देवी जय देवी,
जय महिषासुरमथनी।
सुरवर-ईश्वर-वरदे,
तारक संजीवनी।
जय देवी जय देवी॥

प्रसन्न वदने, प्रसन्न होसी निजदासां।
क्लेशापासूनि सोडी, तोडी भवपाशा।
अंबे, तुजवांचून कोण पुरविल आशा।
नरहरि तल्लीन झाला पदपंकजलेशा॥
जय देवी जय देवी॥

जय देवी जय देवी,
जय महिषासुरमथनी।
सुरवर-ईश्वर-वरदे,
तारक संजीवनी।
जय देवी जय देवी॥

॥ घालीन लोटांगण ॥

यहाँ आपकी आरती की शुद्ध वर्तनी (Spelling) और सुंदर स्वरूप (Formatting) में सुधारा गया रूप प्रस्तुत है:

॥ घालीन लोटांगण ॥

घालीन लोटांगण, वंदीन चरण । डोळ्यांनी पाहीन रूप तुझे । प्रेमें आलिंगन, आनंदे पूजिन । भावें ओवाळीन म्हणे नामा ॥ १ ॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव । त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव । त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ २ ॥

कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा । बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् । करोमि यद्यत् सकलं परस्मै । नारायणायेति समर्पयामि ॥ ३ ॥

अच्युतं केशवं रामनारायणं । कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् । श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं । जानकीनायकं रामचंद्रं भजे ॥ ४ ॥

हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ ५ ॥

श्री सिद्धिविनायक आरती का महत्व

श्री सिद्धिविनायक आरती – सुखकर्ता दुःखहर्ता भगवान श्री गणेश को समर्पित एक प्रसिद्ध भक्तिमय आरती है। इसमें भगवान गणेश के मंगलकारी, विघ्नहर्ता और कल्याणकारी स्वरूप का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। गणेश जी की आराधना भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में विशेष स्थान रखती है।

श्री सिद्धिविनायक आरती कब करें?

भक्त अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार भगवान गणेश की पूजा के समय इस आरती का पाठ कर सकते हैं। गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, गणेश जयंती तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर भी गणेश आरती का विशेष महत्व माना जाता है।

आरती के समय भगवान गणेश का ध्यान करते हुए श्रद्धा और भक्ति के साथ आरती का पाठ किया जा सकता है।

सुखकर्ता दुःखहर्ता आरती का भाव

“सुखकर्ता दुःखहर्ता” का भाव भगवान गणेश के उस स्वरूप से जुड़ा है जो भक्तों के जीवन में सुख और मंगल की कामना का प्रतीक है। आरती में भगवान गणेश के स्वरूप, गुणों और भक्तों के प्रति उनकी कृपा का वर्णन मिलता है।

यह आरती भक्ति, श्रद्धा, समर्पण और सकारात्मक भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम है।

श्री गणेश आरती और धार्मिक परंपरा

भगवान गणेश को सनातन परंपरा में शुभारंभ और मंगल कार्यों से जोड़ा जाता है। किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी का स्मरण करने की परंपरा व्यापक रूप से प्रचलित है।

इस पोस्ट में श्री सिद्धिविनायक आरती – सुखकर्ता दुःखहर्ता के साथ पूजा के दौरान प्रचलित अन्य पारंपरिक प्रार्थनाएँ भी प्रस्तुत की गई हैं। इनमें गणेश आरती के साथ शंकर आरती, देवी आरती और घालीन लोटांगण जैसी प्रार्थनाएँ शामिल हैं।

धार्मिक आरती और पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों, मंदिरों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार भिन्न हो सकती है।

गणपति बप्पा मोरया।

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