वैकुण्ठ चतुर्दशी पौराणिक कथा | Vaikuntha Chaturdashi Pauranik Katha

वैकुण्ठ चतुर्दशी पौराणिक कथा – भगवान विष्णु और भगवान शिव

हिंदू धर्म में वैकुण्ठ चतुर्दशी का पर्व अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। यह तिथि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को आती है और भगवान विष्णु तथा भगवान शिव—दोनों की संयुक्त उपासना से जुड़ी हुई है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने भगवान शिव की आराधना की थी, जिसके कारण यह पर्व विशेष महत्व रखता है।

वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं, दीपदान करते हैं और भगवान विष्णु व महादेव की पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि वैकुण्ठ चतुर्दशी की पौराणिक कथा का श्रद्धा से पाठ या श्रवण करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं, जीवन में सुख-समृद्धि आती है और अंततः वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होती है।

कार्तिक मास को हिंदू धर्म में सर्वाधिक पुण्य और पवित्र महीना माना गया है। शास्त्रों और पुराणों में इस मास का विशेष महत्त्व वर्णित है। इसी कारण कार्तिक मास में आने वाली वैकुण्ठ चतुर्दशी का भी अत्यंत धार्मिक महत्व बताया गया है।

प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को वैकुण्ठ चौदस (वैकुण्ठ चतुर्दशी) का पर्व मनाया जाता है। आइए जानते हैं इस पावन तिथि से जुड़ी पौराणिक कथाएँ


वैकुण्ठ चतुर्दशी की पौराणिक कथा – 1

प्राचीन काल में धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण रहता था। वह अनेक पाप कर्मों में लिप्त था। एक बार वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन वह गोदावरी नदी में स्नान करने गया। उस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु गोदावरी तट पर पूजा-अर्चना के लिए एकत्र हुए थे। धनेश्वर भी उसी भीड़ में सम्मिलित हो गया।

श्रद्धालुओं के पवित्र स्पर्श से धनेश्वर को भी अनजाने में पुण्य की प्राप्ति हुई। जब उसकी मृत्यु हुई, तो यमराज उसे अपने साथ लेकर नरक ले जाने लगे। तभी भगवान विष्णु ने कहा—
“यह व्यक्ति भले ही पापी रहा हो, किंतु इसने वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन गोदावरी में स्नान किया और अन्य श्रद्धालुओं के पुण्य प्रभाव से इसके समस्त पाप नष्ट हो गए हैं। अतः इसे वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होगी।”

इस प्रकार वैकुण्ठ चतुर्दशी के पुण्य प्रभाव से धनेश्वर को मोक्ष प्राप्त हुआ।


वैकुण्ठ चतुर्दशी की पौराणिक कथा – 2

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु, देवाधिदेव महादेव की आराधना के लिए काशी पहुँचे। मणिकर्णिका घाट पर स्नान करने के बाद उन्होंने एक हजार कमलों से भगवान विश्वनाथ की पूजा करने का संकल्प लिया।

पूजन के समय भगवान शिव ने भगवान विष्णु की भक्ति की परीक्षा लेने हेतु एक कमल को अदृश्य कर दिया। जब भगवान विष्णु ने देखा कि एक कमल कम है, तो उन्होंने विचार किया—
“मेरे नेत्र भी कमल के समान हैं। मैं ‘कमलनयन’ और ‘पुण्डरीकाक्ष’ कहलाता हूँ।”

यह सोचकर भगवान विष्णु ने अपनी एक आँख भगवान शिव को अर्पित करने का निश्चय किया। भगवान विष्णु की ऐसी अद्वितीय भक्ति देखकर महादेव तुरंत प्रकट हुए और बोले—
“हे विष्णु! संसार में आपके समान मेरा कोई दूसरा भक्त नहीं है। आज से कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी ‘वैकुण्ठ चतुर्दशी’ के नाम से जानी जाएगी। जो भी इस दिन सर्वप्रथम आपका व्रत और पूजन करेगा, उसे वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होगी।”

कहा जाता है कि इसी दिन भगवान शिव ने करोड़ों सूर्यों के तेज के समान सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु को अर्पित किया था। भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों ने यह भी कहा कि वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं। जो भी व्यक्ति श्रद्धा से इस व्रत को करता है, उसे वैकुण्ठ धाम में स्थान प्राप्त होता है।

Scroll to Top