हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का पर्व अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक महत्व से भरपूर माना गया है। यह रात्रि भगवान शिव की आराधना, तप, साधना और आत्मशुद्धि की प्रतीक है। मान्यता है कि इसी पावन रात्रि में भगवान शिव ने सृष्टि के कल्याण के लिए विभिन्न दिव्य लीलाएँ कीं और भक्तों को मोक्ष का मार्ग प्रदान किया।
महाशिवरात्रि के दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र व भस्म अर्पित कर भगवान शिव की पूजा करते हैं। शास्त्रों के अनुसार महाशिवरात्रि की व्रत-कथा का श्रद्धा से पाठ या श्रवण करने से समस्त पापों का नाश होता है और जीवन में शांति, भक्ति तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
महाशिवरात्रि की कथा भगवान शिव की महिमा, उनके भक्तों की अटूट श्रद्धा और शिव कृपा के दिव्य प्रसंगों का वर्णन करती है, जो प्रत्येक भक्त को धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
महाशिवरात्रि व्रत कथा (Maha Shivratri Ki Kahani)
महाशिवरात्रि की व्रत कथा इस प्रकार है—
एक समय की बात है। माता पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से प्रश्न किया—
“हे प्रभु! ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ और सरल व्रत तथा पूजन है, जिसके द्वारा मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर सकते हैं?”
माता पार्वती के प्रश्न के उत्तर में भगवान शिव ने महाशिवरात्रि व्रत का विधान बताते हुए यह पावन कथा सुनाई—
एक गाँव में चित्रभानु नामक एक शिकारी रहता था। वह पशुओं का शिकार कर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, किंतु समय पर ऋण न चुका पाने के कारण साहूकार ने उसे शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोगवश उसी दिन शिवरात्रि थी।
शिवमठ में रहते हुए शिकारी ने ध्यानपूर्वक शिव से संबंधित धार्मिक बातें सुनीं। चतुर्दशी के दिन उसने शिवरात्रि की कथा का भी श्रवण किया। संध्या होते ही साहूकार ने उसे बुलाया। शिकारी ने अगले दिन पूरा ऋण चुकाने का वचन दिया, तब जाकर उसे बंधन से मुक्त किया गया।
अगले दिन वह प्रतिदिन की भाँति शिकार के लिए जंगल की ओर निकल पड़ा। दिनभर भूखा-प्यासा रहने के कारण वह अत्यंत व्याकुल था। शिकार की तलाश में वह एक तालाब के किनारे स्थित बेल वृक्ष पर चढ़कर पड़ाव बनाने लगा। उसी वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था, जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। अनजान शिकारी को इसका आभास नहीं हुआ।
पड़ाव बनाते समय उसने जो बेल की टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिर गईं। इस प्रकार भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी का अनजाने में व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित हो गए।
रात्रि का पहला पहर बीतने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर जल पीने आई। शिकारी ने जैसे ही धनुष पर तीर चढ़ाया, मृगी बोली—
“हे पारधी! मैं गर्भवती हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। यदि तुम मुझे मारोगे, तो दो जीवों की हत्या होगी। मैं अपने शिशु को जन्म देकर शीघ्र ही लौट आऊँगी।”
मृगी की बात सुनकर शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और वह झाड़ियों में चली गई।
कुछ समय बाद एक दूसरी मृगी वहाँ पहुँची। शिकारी ने फिर से बाण चढ़ाया। इस बार भी कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर गिर गए और इस प्रकार दूसरे प्रहर की पूजा भी पूर्ण हो गई। मृगी ने विनम्रतापूर्वक कहा—
“हे पारधी! मैं अभी ऋतु से निवृत्त हुई हूँ और अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं उनसे मिलकर शीघ्र ही लौट आऊँगी।”
शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार हाथ से निकल जाने पर वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का अंतिम पहर चल रहा था। तभी एक और मृगी अपने बच्चों के साथ वहाँ आई। शिकारी ने बाण छोड़ने की तैयारी की, पर मृगी बोली—
“हे पारधी! मैं अपने बच्चों को उनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौट आऊँगी। कृपया अभी मुझे मत मारो।”
मृगी के दीन स्वर और मातृत्व भाव ने शिकारी के हृदय को द्रवित कर दिया। उसने इस मृगी को भी जीवनदान दे दिया। शिकार न मिलने पर वह बेलवृक्ष पर बैठा लगातार बेलपत्र तोड़कर नीचे गिराता रहा।
तभी वहाँ एक हृष्ट-पुष्ट मृग आया। शिकारी ने निश्चय किया कि अब वह शिकार करेगा। किंतु मृग ने विनम्र स्वर में कहा—
“हे पारधी भाई! यदि तुमने मेरी तीनों पत्नियों और बच्चों को मार दिया है, तो मुझे भी मार दो। और यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है, तो मुझे भी कुछ समय का जीवनदान दो। मैं उनसे मिलकर शीघ्र ही लौट आऊँगा।”
मृग की बात सुनकर शिकारी को पूरी रात की घटनाएँ स्मरण हो आईं। उसने सब कुछ मृग को बता दिया। मृग ने कहा—
“यदि मेरी पत्नियाँ लौट न सकीं, तो वे अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। जैसे तुमने उन्हें विश्वास करके छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो।”
उपवास, रात्रि जागरण और अनजाने में शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पण से शिकारी का हिंसक हृदय कोमल हो चुका था। उसमें करुणा और दया का भाव जाग्रत हो गया। भगवान शिव की कृपा से धनुष-बाण उसके हाथ से छूट गए और वह अपने पूर्व कर्मों पर पश्चाताप करने लगा।
कुछ ही देर में मृग सपरिवार लौट आया। उनकी सत्यनिष्ठा, प्रेम और धर्मभाव को देखकर शिकारी अत्यंत लज्जित हो गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने सदा के लिए हिंसा का त्याग कर दया और करुणा का मार्ग अपना लिया।
देवलोक से देवताओं ने इस घटना को देखा और पुष्पवर्षा की। भगवान शिव की कृपा से शिकारी तथा मृग परिवार सभी को मोक्ष की प्राप्ति हुई।
इस प्रकार महाशिवरात्रि की व्रत कथा संपन्न हुई। 🙏



