हिंदू धर्म में भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—का संयुक्त अवतार माना जाता है। वे ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और गुरु तत्व के प्रतीक हैं। भगवान दत्तात्रेय की जन्म कथा अत्यंत पावन और आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण है, जो साधकों और भक्तों को जीवन का सही मार्ग दिखाती है।
शास्त्रों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय का अवतार ऋषि अत्रि और माता अनुसूया की तपस्या के फलस्वरूप हुआ। उनकी जन्म कथा धर्म, त्याग, ब्रह्मचर्य और गुरु-शिष्य परंपरा का अद्भुत संदेश देती है। दत्तात्रेय जन्म कथा का श्रद्धा से पाठ या श्रवण करने से व्यक्ति को ज्ञान, सद्बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।
दत्तात्रेय जयंती मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। पुराणों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनों देवों का संयुक्त स्वरूप माना गया है। उनकी उपासना करने से त्रिदेवों का संयुक्त आशीर्वाद प्राप्त होता है।
आइए जानते हैं भगवान दत्तात्रेय के जन्म से जुड़ी पौराणिक कथा—
दत्तात्रेय जयंती की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार तीनों देवियों—देवी सरस्वती, देवी लक्ष्मी और देवी पार्वती—को अपनी पवित्रता और अपने-अपने पतियों के प्रति निष्ठा पर गर्व हुआ। तब भगवान विष्णु ने एक दिव्य लीला रची।
देवर्षि नारद ने तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए देवियों के समक्ष माता अनसूया की पतिव्रता धर्म और उनके अद्भुत तप की प्रशंसा की। यह सुनकर ईर्ष्यावश तीनों देवियों ने माता अनसूया की पति-भक्ति की परीक्षा लेने का निश्चय किया।
जब महर्षि अत्रि आश्रम से बाहर गए हुए थे, तब त्रिदेव ब्राह्मणों का वेश धारण कर उनके आश्रम पहुँचे। माता अनसूया ने जब उन तीनों ब्राह्मणों को देखा, तो आदरपूर्वक उनका स्वागत करने आगे बढ़ीं। किंतु ब्राह्मण वेशधारी त्रिदेवों ने शर्त रखी कि जब तक माता अनसूया उन्हें अपनी गोद में बैठाकर भोजन नहीं कराएँगी, वे आतिथ्य स्वीकार नहीं करेंगे।
इस शर्त से माता अनसूया विचलित हो गईं। तभी अपने तपोबल से उन्होंने उन ब्राह्मणों की वास्तविकता जान ली। भगवान विष्णु और अपने पति महर्षि अत्रि का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा—
“यदि मेरा पतिव्रत धर्म सत्य है, तो ये तीनों ब्राह्मण छह-छह महीने के शिशु बन जाएँ।”
माता अनसूया के तपोबल से त्रिदेव शिशु रूप में परिवर्तित हो गए और रोने लगे। तब माता अनसूया ने करुणा से भरकर उन तीनों को अपनी गोद में लिया और उन्हें दूध पिलाया।
उधर, जब तीनों देवियों को अपने पतियों के लौटने में विलंब हुआ, तो वे चिंतित हो उठीं। तब देवर्षि नारद ने उन्हें समस्त घटना से अवगत कराया। अपनी भूल का आभास होने पर तीनों देवियों ने माता अनसूया से क्षमा याचना की और त्रिदेवों को उनके मूल स्वरूप में वापस लाने का निवेदन किया।
माता अनसूया ने अपने तपोबल से तीनों शिशुओं को उनके दिव्य स्वरूप में पुनः प्रकट किया। इसके पश्चात त्रिदेवों ने माता अनसूया से वरदान माँगने को कहा। माता ने वरदान स्वरूप त्रिदेवों से एक पुत्र की कामना की। त्रिदेवों ने यह वर प्रदान किया और अपने-अपने धाम को लौट गए।
इसके बाद माता अनसूया के गर्भ से भगवान दत्तात्रेय, महर्षि दुर्वासा (शिव अंश) और चंद्रमा (ब्रह्मा अंश) का प्राकट्य हुआ।
कुछ मान्यताओं के अनुसार, भगवान दत्तात्रेय त्रिदेवों के एकल संयुक्त स्वरूप में ही प्रकट हुए थे। इसी कारण भगवान दत्तात्रेय की पूजा करने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश—तीनों की कृपा एक साथ प्राप्त होती है। 🙏



