अपरा एकादशी व्रत कथा (Apara Ekadashi Vrat Katha) का हिंदू धर्म में अत्यंत विशेष महत्व बताया गया है। यह पावन एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आती है और भगवान श्री विष्णु को समर्पित होती है। इस एकादशी को अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत करने और इसकी कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से पापों का नाश, यश, कीर्ति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से अकस्मात दोषों, दरिद्रता और मानसिक कष्टों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। कहा जाता है कि इस एकादशी के प्रभाव से मनुष्य को इस लोक में सम्मान और परलोक में उत्तम गति प्राप्त होती है।
अपरा एकादशी की कथा का प्रारंभ करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—
“हे राजन्! इस एकादशी को अपरा तथा अचला—दोनों नामों से जाना जाता है। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को अपरा एकादशी कहा गया है। यह एकादशी अपार धन और यश प्रदान करने वाली मानी गई है। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करता है, वह समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।
इस दिन भगवान विष्णु के त्रिविक्रम अवतार की पूजा का विशेष महत्व है। अपरा एकादशी का व्रत ब्रह्महत्या, भूत-योनि, परनिंदा आदि अनेक महापापों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। इसके अतिरिक्त, इस व्रत के प्रभाव से परस्त्रीगमन, झूठी गवाही देना, असत्य बोलना, झूठे शास्त्रों का अध्ययन या रचना, झूठा ज्योतिषी या वैद्य बनना जैसे पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
जो क्षत्रिय युद्ध से पलायन करते हैं, उन्हें नरक का भागी कहा गया है, किंतु अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी देवलोक को प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उनकी निंदा करते हैं, वे घोर पाप के भागी होते हैं; परंतु अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी इस पाप से मुक्त हो जाते हैं।
जो पुण्य तीनों पुष्करों में कार्तिक पूर्णिमा के स्नान, गंगा तट पर पितरों को पिंडदान, मकर संक्रांति पर प्रयागराज स्नान, महाशिवरात्रि व्रत, सिंह राशि में बृहस्पति के समय गोमती स्नान, कुंभ में केदारनाथ या बद्रीनाथ दर्शन, सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र स्नान, स्वर्णदान अथवा अर्धप्रसूता गौदान से प्राप्त होता है—वही पुण्य अपरा एकादशी के व्रत से भी प्राप्त होता है।
यह व्रत पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी, पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए अग्नि, पापरूपी अंधकार को दूर करने के लिए सूर्य और पापरूपी मृगों के संहार के लिए सिंह के समान बताया गया है। अतः जो मनुष्य पापों से भयभीत है, उसे इस व्रत का अवश्य पालन करना चाहिए।
अपरा एकादशी का व्रत रखने और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर अंततः विष्णुलोक को प्राप्त करता है।



