Narak Chaturdashi Pujan Vidhi | नरक चतुर्दशी पूजा विधि

Narak Chaturdashi Pujan Vidhi Diwali Rituals Hindu Puja

नरक चतुर्दशी दीपावली पर्व से एक दिन पहले मनाया जाने वाला अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन को छोटी दिवाली या रूप चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर देवताओं और पृथ्वी को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया था। इसी कारण यह पर्व अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है।

नरक चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल अभ्यंग स्नान, दीपदान और विधिपूर्वक पूजा करने से पापों का नाश, नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से व्यक्ति को नरक भय से मुक्ति मिलती है और दीर्घायु तथा आरोग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

यह दिन दीपावली के शुभ आरंभ का संकेत भी देता है और घर, शरीर व मन—तीनों की शुद्धि का विशेष महत्व रखता है।

Narak Chaturdashi Pujan Vidhi | नरक चतुर्दशी पूजा विधि


🪔 नरक चतुर्दशी पूजा सामग्री

  • काले तिल
  • चावल
  • लकड़ी की चौकी
  • चाँदी के सिक्के
  • दीये
  • पूजा थाली
  • रोली
  • धूप
  • फूल और मिठाई

🙏 प्रार्थना

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को प्रातःकाल अपामार्ग को स्नान के समय मस्तक पर घुमाना चाहिए। ऐसा करने से नरक के भय का नाश होता है। उस समय निम्न प्रकार से प्रार्थना करें—

सीता-लोष्टा-सह-युक्तः शकंटक-दलनान्वितः।
हर पापमपमार्ग! भ्राम्यमाणः पुनः पुनः॥


💧 तर्पण विधि

स्नान के पश्चात् यमराज के चौदह नामों का तीन-तीन बार उच्चारण करके तर्पण (जल-दान) करना चाहिए।
साथ ही श्री भीष्म पितामह को तीन अंजलियाँ जल अर्पित करनी चाहिए।
यहाँ तक कि जिनके पिता जीवित हों, उन्हें भी यह जल-अंजलि देना शास्त्रानुसार उचित माना गया है।

तर्पण हेतु यमराज के निम्नलिखित 14 नामों का तीन बार उच्चारण करें—

ॐ यमाय नमः॥
ॐ धर्मराजाय नमः॥
ॐ मृत्यवे नमः॥
ॐ अन्तकाय नमः॥
ॐ वैवस्वताय नमः॥
ॐ कालाय नमः॥
ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः॥
ॐ औदुम्बराय नमः॥
ॐ दध्नाय नमः॥
ॐ नीलाय नमः॥
ॐ परमेष्ठिने नमः॥
ॐ वृकोदराय नमः॥
ॐ चित्राय नमः॥
ॐ चित्रगुप्ताय नमः॥


🪔 दीपदान विधि

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की सायंकाल घर के बाहर नरक-निवृत्ति के लिए
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों का प्रतीक मानकर चार बत्तियों वाला दीपक
यमदेव के लिए सर्वप्रथम जलाना चाहिए।

इसके पश्चात्—

  • गोशाला
  • देव वृक्षों के नीचे
  • रसोईघर
  • स्नानागार

आदि स्थानों पर दीपक जलाएँ।
इस प्रकार दीपदान करने के बाद नित्य पूजन करें।

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