Aja Ekadashi Vrat Katha | अजा एकादशी व्रत कथा

Aja Ekadashi Vrat Katha devotion to Lord Vishnu and King Harishchandra

अजा एकादशी व्रत कथा (Aja Ekadashi Vrat Katha) का सनातन धर्म में अत्यंत विशेष महत्व है। यह पावन एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आती है और भगवान श्री विष्णु को समर्पित होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस एकादशी का व्रत करने और कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होते हैं तथा उसे जीवन में सुख, शांति और वैष्णव कृपा की प्राप्ति होती है।

अजा एकादशी विशेष रूप से पितृ दोष शांति, पुण्य वृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए जानी जाती है। इस व्रत को विधि-विधान से करने से पूर्व जन्म के दोष दूर होते हैं और भक्त के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

श्रावण मास के पश्चात भाद्रपद मास में आने वाली एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष में आती है। इस एकादशी का सनातन धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। जिस प्रकार यह तिथि अत्यंत पुण्यदायिनी मानी जाती है, उसी प्रकार इस दिन पढ़ी और सुनी जाने वाली व्रत कथा को भी विशेष फलदायी माना गया है।

अजा एकादशी के दिन पढ़ी जाने वाली व्रत कथा इस प्रकार है—

अर्जुन ने कहा—
“हे पुण्डरीकाक्ष! मैंने श्रावण शुक्ल एकादशी, अर्थात पुत्रदा एकादशी, का विस्तृत वर्णन सुना है। अब कृपया मुझे भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के विषय में बताइए। इस एकादशी का क्या नाम है, इसकी व्रत-विधि क्या है और इसका व्रत करने से कौन-से फल प्राप्त होते हैं?”

भगवान वासुदेव बोले—
“हे पार्थ! इस एकादशी का नाम अजा एकादशी है। जो मनुष्य इस दिन भगवान ऋषिकेश का विधि-विधान से पूजन करता है, वह अंततः वैकुंठ धाम को प्राप्त करता है। अब तुम इसकी पावन कथा ध्यानपूर्वक सुनो।”

प्राचीन काल में राजा हरिश्चंद्र नामक एक महान और सत्यवादी राजा राज्य करता था। किसी पूर्व कर्म के कारण उन्हें अपना संपूर्ण राज-पाठ और धन त्यागना पड़ा। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी पत्नी, पुत्र और अंततः स्वयं को भी बेच दिया।

राज्य और वैभव छिन जाने के बाद भी राजा हरिश्चंद्र सत्य के मार्ग से विचलित नहीं हुए। वे एक चांडाल के दास बनकर मृतकों के वस्त्र धारण करने का कार्य करते रहे। इतने कष्ट सहने के बाद भी उन्होंने सत्य का त्याग नहीं किया। किंतु उनके मन में यह चिंता बार-बार उठती रहती थी कि उनका उद्धार कैसे होगा और इस संकट से निकलने का मार्ग क्या है।

इसी चिंता में अनेक वर्ष व्यतीत हो गए। एक दिन उनके पास गौतम ऋषि पधारे। राजा ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और अपनी सम्पूर्ण व्यथा उनके सामने रख दी। राजा की दयनीय स्थिति देखकर गौतम ऋषि को अत्यंत दुःख हुआ और उन्होंने उन्हें मुक्ति का मार्ग बताया।

गौतम ऋषि ने कहा—
“हे राजन! आज से ठीक सात दिन बाद भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी आएगी। तुम श्रद्धा और विधि-विधान से इस एकादशी का व्रत और पूजन करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे।”

इतना कहकर गौतम ऋषि अंतर्ध्यान हो गए। उनके निर्देशानुसार राजा हरिश्चंद्र ने अजा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। इस व्रत के चमत्कारी प्रभाव से राजा के सभी पाप नष्ट हो गए।

व्रत के फलस्वरूप राजा के मृत पुत्र पुनः जीवित हो गए, उनकी पत्नी वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित दिखाई दीं और राजा को अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हुआ। अंततः राजा हरिश्चंद्र अपने परिवार सहित स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—
“हे प्रिय राजन! यह सब अजा एकादशी व्रत का महात्म्य है। जो मनुष्य श्रद्धा से इस व्रत का पालन करता है, उपवास और रात्रि जागरण करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वह अंत में स्वर्ग को प्राप्त होता है। इस व्रत कथा को पढ़ने या सुनने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।”

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