हिंदू धर्म में गोपाष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण और गौ माता की उपासना से जुड़ा हुआ एक पवित्र व्रत माना जाता है। यह व्रत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पहली बार गौचारण लीला का आरंभ किया था और ग्वाल रूप में गायों की सेवा का दायित्व संभाला था।
गोपाष्टमी के दिन गौ माता की पूजा, सेवा और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि गोपाष्टमी व्रत कथा का श्रद्धा से पाठ या श्रवण करने से व्यक्ति को श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है, जीवन के कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन गौ माता का विशेष रूप से पूजन किया जाता है और गौ रक्षा का संकल्प लिया जाता है। गोपाष्टमी पर्व के पीछे एक सुंदर और प्रेरणादायक पौराणिक कथा प्रचलित है।
गोपाष्टमी (Gopashtami Vrat Katha) के दिन पूजा के पश्चात व्रत कथा का पाठ किया जाता है। मान्यता है कि कथा पढ़े बिना यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता। आइए जानते हैं गोपाष्टमी व्रत कथा—
गोपाष्टमी व्रत कथा | Gopashtami Vrat Katha
प्राचीन काल की बात है। जब बालक श्रीकृष्ण लगभग छह वर्ष के थे, तब उन्होंने अपनी माता यशोदा से कहा—
“माँ, अब मैं बड़ा हो गया हूँ। अब मैं बछड़े नहीं, बल्कि गायें चराऊँगा।”
माता यशोदा ने यह बात नंद बाबा को बताते हुए कहा कि निर्णय लेने से पहले एक बार उनसे अवश्य पूछ लिया जाए। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण स्वयं नंद बाबा के पास पहुँचे और उनसे गायें चराने की अनुमति मांगी।
नंद बाबा ने बाल गोपाल को समझाने का प्रयास किया, किंतु श्रीकृष्ण की दृढ़ इच्छा के आगे उनकी एक न चली। अंततः नंद बाबा ने कहा—
“यदि तुम्हारी यही इच्छा है, तो पहले पंडित जी से पूछ लो कि गाय चराने का शुभ मुहूर्त कब है।”
यह सुनकर बाल गोपाल पंडित जी के पास पहुँचे और उनसे बोले—
“नंद बाबा ने आपको गाय चराने का शुभ समय जानने के लिए बुलाया है। यदि आप आज का शुभ मुहूर्त बता दें, तो मैं आपको ढेर सारा मक्खन दूँगा।”
पंडित जी नंद बाबा के पास पहुँचे और पंचांग देखकर बताया—
“आज का दिन गौ-पालन आरंभ करने के लिए अत्यंत शुभ है। इसके बाद पूरे एक वर्ष तक गौ-पालन के लिए कोई अन्य शुभ मुहूर्त नहीं मिलेगा।”
पंडित जी की बात सुनकर नंद बाबा ने विचार किया और श्रीकृष्ण को गायें चराने की अनुमति दे दी। उसी दिन से भगवान श्रीकृष्ण ने गायों का पालन-पोषण आरंभ किया।
जिस दिन बाल गोपाल ने पहली बार गायें चरानी शुरू कीं, वह दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी थी। इसी कारण इस तिथि को गोपाष्टमी के नाम से जाना गया।



