हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का पर्व अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। यह वह पावन तिथि है जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिससे सूर्य उत्तरायण होते हैं। इस परिवर्तन को आध्यात्मिक उन्नति, शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है।
मकर संक्रांति के दिन स्नान, दान, जप और व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन मकर संक्रांति व्रत कथा का श्रद्धा से पाठ या श्रवण करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, समृद्धि तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है। यह व्रत सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने और आत्मशुद्धि के लिए विशेष फलदायी माना गया है।
मकर संक्रांति एक प्रमुख हिंदू पर्व है, जो प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और इसी कारण इसे मकर संक्रांति कहा जाता है। इस तिथि से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं, जिसे शुभता, पुण्य और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक माना गया है।
मकर संक्रांति व्रत कथा | Makar Sankranti Vrat Katha
पुराणों के अनुसार भगवान सूर्यदेव और उनके पुत्र शनिदेव के बीच आरंभ में संबंध मधुर नहीं थे। इसका मुख्य कारण सूर्यदेव का अपनी पत्नी छाया के प्रति कठोर व्यवहार बताया जाता है।
जब शनिदेव का जन्म हुआ, तब उनकी श्याम वर्ण की काया देखकर सूर्यदेव क्रोधित हो गए और उन्होंने कहा,
“मेरा ऐसा पुत्र नहीं हो सकता।”
इसी कारण सूर्यदेव ने जन्म के बाद शनिदेव को उनकी माता छाया से अलग कर दिया। जिस स्थान पर वे रहते थे, उसे कुंभ कहा जाता था।
सूर्यदेव के इस व्यवहार से माता छाया अत्यंत दुःखी और क्रोधित हुईं। उन्होंने सूर्यदेव को कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया। इस श्राप से आहत होकर सूर्यदेव ने क्रोधवश छाया और शनिदेव के निवास स्थान को जला दिया।
कुछ समय पश्चात सूर्यदेव के पुत्र यम ने अपनी माता संज्ञा के साथ मिलकर सूर्यदेव को इस श्राप से मुक्त कराया। यमराज ने सूर्यदेव को माता छाया और शनिदेव के प्रति अपने व्यवहार में परिवर्तन लाने की सलाह भी दी।
अपनी भूल का एहसास होने पर सूर्यदेव माता छाया और पुत्र शनिदेव से मिलने उनके निवास स्थान पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि उनका घर जलकर नष्ट हो चुका है।
सूर्यदेव को देखकर शनिदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने पिता का काले तिलों से स्वागत किया। पुत्र के इस व्यवहार से सूर्यदेव बहुत प्रसन्न हुए।
सूर्यदेव ने शनिदेव को मकर नामक नया घर प्रदान किया और अपने आशीर्वाद से उन्हें कुंभ और मकर—दोनों राशियों का स्वामी बना दिया।
सूर्यदेव ने शनिदेव को यह वरदान भी दिया कि जब-जब वे उनसे मिलने आएँगे, उनका घर धन-धान्य से परिपूर्ण रहेगा। साथ ही सूर्यदेव ने कहा—
“जो व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन मुझे काले तिल का दान करेगा, उसके जीवन में सुख और समृद्धि बनी रहेगी।”
इसी कारण मकर संक्रांति के अवसर पर सूर्यदेव की पूजा में काले तिलों का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस दिन काले तिल का दान और उपयोग करने से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती।



