हिंदू धर्म में बृहस्पतिवार व्रत का विशेष धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व माना गया है। यह व्रत देवगुरु बृहस्पति को समर्पित होता है, जिन्हें ज्ञान, धर्म, बुद्धि, गुरु कृपा और शुभ भाग्य का प्रतीक माना गया है। बृहस्पतिदेव भगवान विष्णु के परम भक्त तथा देवताओं के गुरु हैं।
बृहस्पतिवार के दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर बृहस्पतिदेव की पूजा, कथा का पाठ और पीले वस्त्रों व पीली वस्तुओं का दान करने से जीवन में ज्ञान, धन, संतान सुख और वैवाहिक शांति की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि बृहस्पतिवार व्रत कथा का श्रद्धा से श्रवण करने से गुरु दोष शांत होता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
॥ बृहस्पतिदेव की कथा – भाग 1 ॥
भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानशील राजा राज्य करता था। वह प्रतिदिन निर्धनों और ब्राह्मणों की सहायता करता तथा दान-पुण्य में विश्वास रखता था।
परंतु उसकी रानी को यह सब अच्छा नहीं लगता था। वह न तो दान देती थी, न ही भगवान का पूजन करती थी, और राजा को भी दान करने से रोकती रहती थी।
एक दिन राजा शिकार के लिए वन गए हुए थे। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु का वेश धारण कर भिक्षा माँगने महल पहुँचे। रानी ने भिक्षा देने से इनकार करते हुए कहा—
“हे साधु महाराज! मैं दान-पुण्य से तंग आ चुकी हूँ। मेरा पति सारा धन लुटा देता है। मेरी इच्छा है कि हमारा सारा धन नष्ट हो जाए, ताकि यह सब समाप्त हो जाए।”
साधु बोले—
“देवी! तुम्हारा विचार विचित्र है। धन और संतान तो सभी चाहते हैं। यदि अधिक धन है, तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, यात्रियों के लिए धर्मशालाएँ खुलवाओ और निर्धनों की कन्याओं का विवाह कराओ। इससे तुम्हारा यश लोक-परलोक में फैलेगा।”
पर रानी पर इन उपदेशों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने कहा—
“मैं ऐसा धन नहीं चाहती, जिसे हर जगह बाँटना पड़े।”
तब साधु बोले—
“यदि यही तुम्हारी इच्छा है तो तथास्तु! बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्टी से सिर धोकर स्नान करना और भट्टी पर कपड़े धोना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा।”
इतना कहकर साधु अंतर्धान हो गए।
साधु के कहे अनुसार रानी ने केवल तीन बृहस्पतिवार ऐसा किया और उसकी सारी धन-संपत्ति नष्ट हो गई।
परिवार भोजन के लिए तरसने लगा। तब राजा ने रानी से कहा—
“तुम यहीं रहो, मैं परदेस जाता हूँ। यहाँ सब मुझे जानते हैं, इसलिए कोई छोटा काम नहीं कर सकता।”
राजा परदेश चला गया और वहाँ लकड़ी काटकर बेचने लगा। इधर रानी और दासी दुःखी रहने लगीं।
एक बार सात दिनों तक बिना भोजन के रहने के बाद रानी ने दासी से कहा—
“पास के नगर में मेरी बहन रहती है। वह धनवान है। उसके पास जाकर कुछ ले आओ।”
उस दिन गुरुवार था। रानी की बहन बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। दासी का संदेश सुनकर भी वह कथा के बीच नहीं बोली। दासी दुःखी होकर लौट आई।
कथा समाप्त होने के बाद बहन को अपनी भूल का अहसास हुआ। वह तुरंत रानी के पास पहुँची। रानी ने अपने दुखों की पूरी कथा सुना दी।
बहन बोली—
“भगवान बृहस्पतिदेव कृपा करने वाले हैं। देखो, शायद घर में कहीं अनाज रखा हो।”
जाँच करने पर सचमुच एक घड़ा अनाज से भरा मिला। यह देखकर दासी ने कहा—
“जब भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही करते हैं। क्यों न बृहस्पतिवार व्रत किया जाए?”
बहन ने व्रत की विधि बताई—
बृहस्पतिवार को चने की दाल और मुनक्का अर्पित कर, केले की जड़ में भगवान विष्णु का पूजन करना, दीपक जलाना और पीला भोजन ग्रहण करना।
अगले गुरुवार रानी और दासी ने व्रत रखा। भगवान बृहस्पतिदेव प्रसन्न हुए और साधारण मनुष्य के रूप में उन्हें पीला भोजन प्रदान किया। धीरे-धीरे उनके घर में फिर से धन-संपत्ति आने लगी।
दासी के समझाने पर रानी ने दान-पुण्य आरंभ किया, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा।
जिस प्रकार रानी पर कृपा हुई, उसी प्रकार सभी भक्तों को सुख-समृद्धि प्राप्त हो।
॥ बृहस्पतिदेव की कथा – भाग 2 ॥
प्राचीन काल में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसकी कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नी स्नान-पूजन नहीं करती थी, जिससे ब्राह्मण अत्यंत दुःखी रहते थे।
भगवान की कृपा से उन्हें एक कन्या की प्राप्ति हुई। बड़ी होकर वह कन्या प्रतिदिन स्नान कर भगवान विष्णु का जप करती और बृहस्पतिवार का व्रत रखने लगी। विद्यालय जाते समय वह जौ बिखेरती और लौटते समय वे जौ स्वर्ण में परिवर्तित हो जाते।
एक दिन उसके पिता ने कहा—
“बेटी, सोने के जौ के लिए सोने का सूप होना चाहिए।”
अगले बृहस्पतिवार कन्या ने व्रत रखकर प्रार्थना की और उसे सोने का सूप प्राप्त हुआ।
एक दिन उस नगर का राजकुमार उसे देखकर मोहित हो गया और उससे विवाह की इच्छा प्रकट की। विधिपूर्वक विवाह सम्पन्न हुआ।
कन्या के विदा होते ही उसके माता-पिता फिर निर्धन हो गए। बाद में कन्या ने अपनी माता को व्रत विधि सिखाई। प्रारंभ में माता ने नियम नहीं माने, किंतु बाद में विधिपूर्वक व्रत रखने लगी।
इस व्रत के प्रभाव से उसके माता-पिता धनवान और संतानवान हुए तथा जीवन के सुख भोगकर स्वर्ग को प्राप्त हुए।
बृहस्पतिवार व्रत कथा का महत्व
बृहस्पतिवार का व्रत और उसकी कथा श्रद्धापूर्वक सुनने से जीवन में अपार लाभ होते हैं। यह व्रत धन, समृद्धि, संतान सुख और पारिवारिक शांति प्रदान करता है। विधिपूर्वक व्रत करने से दरिद्रता दूर होती है, विवाह में आ रही बाधाएँ समाप्त होती हैं और जीवन में सुख-शांति का वास होता है।



