हिंदू धर्म में नृसिंह जयंती का पर्व अत्यंत पवित्र और शक्ति-प्रदायक माना जाता है। यह तिथि भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार के प्राकट्य की स्मृति में मनाई जाती है। वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान विष्णु ने भक्त प्रह्लाद की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए अर्ध-सिंह, अर्ध-मानव स्वरूप में अवतार लिया था।
नृसिंह जयंती का व्रत भय, बाधा और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाला माना गया है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखकर भगवान नृसिंह की पूजा, मंत्र जाप और कथा का पाठ करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि नृसिंह जयंती व्रत और कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से मनुष्य के समस्त भय, पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं तथा जीवन में साहस, भक्ति और धर्म की स्थापना होती है।
नृसिंह जयंती व्रत कथा में भगवान नृसिंह के प्राकट्य, भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति और हिरण्यकशिपु के अहंकार के विनाश का दिव्य वर्णन मिलता है। यह कथा भक्त को यह संदेश देती है कि सच्ची भक्ति के आगे कोई भी शक्ति टिक नहीं सकती और भगवान सदैव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।
व्रत कथा
भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की कथा की शुरुआत ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्रों से होती है।
उनके दोनों पुत्रों के नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष थे। कठोर तपस्या और आराधना द्वारा उन्होंने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान स्वरूप अजेय होने का आशीर्वाद प्रदान किया।
इस वरदान को प्राप्त कर हिरण्यकशिपु अपने भाई हिरण्याक्ष के साथ अत्यंत शक्तिशाली हो गया। सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा से प्राप्त शक्तियों के बल पर दोनों भाइयों ने तीनों लोकों को जीतने का प्रयास किया और स्वर्गलोक पर अधिकार करने की योजना बनाई। उनके बढ़ते अत्याचारों से त्रस्त होकर भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर हिरण्याक्ष का वध किया।
वरदान के प्रभाव के कारण देवतागण हिरण्यकशिपु को पराजित करने में असमर्थ रहे। इसी काल में हिरण्यकशिपु को एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद भगवान नारायण के परम भक्तों में से एक था।
हिरण्यकशिपु के निरंतर प्रयासों के बावजूद प्रह्लाद ने भगवान विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी। प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा और समर्पण के कारण भगवान नारायण ने सदैव उसकी रक्षा की। पुत्र की इस भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक प्रकार से मारने का प्रयास किया।
एक बार उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे। मान्यता है कि होलिका को एक दिव्य शाल प्राप्त थी, जिससे वह अग्नि में भी सुरक्षित रहती थी।
जब अग्नि की लपटें भड़क उठीं, तब वह दिव्य शाल होलिका से फिसलकर प्रह्लाद को ढक गई। परिणामस्वरूप प्रह्लाद पूर्णतः सुरक्षित रहा, जबकि होलिका अग्नि में जलकर भस्म हो गई। इसी घटना की स्मृति में होली के पूर्व दिवस को होलिका दहन के रूप में मनाया जाता है।
अपनी योजनाओं की विफलता और बहन की मृत्यु से अत्यंत क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से उसके भगवान के अस्तित्व को सिद्ध करने की चुनौती दी।
प्रह्लाद ने दृढ़ विश्वास के साथ उत्तर दिया कि भगवान विष्णु सर्वत्र विद्यमान हैं—हर कण, हर वस्तु और महल के प्रत्येक स्तंभ में भी वही व्याप्त हैं। यह सुनकर क्रोध में अंधे हिरण्यकशिपु ने एक खंभे पर प्रहार किया। उसी क्षण भगवान विष्णु नृसिंह के भयानक रूप में प्रकट हुए और हिरण्यकशिपु का वध किया।
भगवान नृसिंह के इस दिव्य प्राकट्य का दिन नृसिंह जयंती के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।



