साईं बाबा चालीसा श्री साईं बाबा को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और लोकप्रिय स्तुति है। श्रद्धा और विश्वास के साथ साईं चालीसा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, धैर्य और जीवन की कठिनाइयों से राहत मिलती है। श्री साईं बाबा को करुणा, सेवा और सद्भाव का प्रतीक माना जाता है, और उनकी आराधना से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
Sai Baba Chalisa is a powerful devotional hymn that describes the divine grace, compassion, and miracles of Shirdi Sai Baba.
साईं चालीसा (Sai Baba Chalisa) – शुद्ध एवं सुव्यवस्थित पाठ
पहले साईं के चरणों में,
अपना शीश नमाऊँ मैं।
कैसे शिरडी साईं आए,
सारा हाल सुनाऊँ मैं॥
कौन है माता, पिता कौन है,
ये न किसी ने भी जाना।
कहाँ जन्म साईं ने धारा,
प्रश्न पहेली रहा बना॥
कोई कहे अयोध्या के,
ये रामचंद्र भगवान हैं।
कोई कहता साईं बाबा,
पवन-पुत्र हनुमान हैं॥
कोई कहता मंगल-मूर्ति,
श्री गजानन हैं साईं।
कोई कहता गोकुल-मोहन,
देवकी-नंदन हैं साईं॥
शंकर समझे भक्त कई तो,
बाबा को भजते रहते।
कोई कहे अवतार दत्त का,
पूजा साईं की करते॥
कुछ भी मानो उनको तुम,
पर साईं हैं सच्चे भगवान।
बड़े दयालु दीनबंधु,
कितनों को दिया जीवन-दान॥
कई वर्ष पहले की घटना,
तुम्हें सुनाऊँ मैं बात।
किसी भाग्यशाली की,
शिरडी में आई थी बारात॥
आया साथ उसी के था,
बालक एक बहुत सुंदर।
आया, आकर वहीं बस गया,
पावन शिरडी किया नगर॥
कई दिनों तक भटकता रहा,
भिक्षा माँगी उसने दर-दर।
और दिखाई ऐसी लीला,
जग में जो हो गई अमर॥
जैसे-जैसे उम्र बढ़ी,
वैसे-वैसे बढ़ती शान।
घर-घर होने लगा नगर में,
साईं बाबा का गुणगान॥
दिग-दिगंत में गूँज उठा,
फिर तो साईंजी का नाम।
दीन-दुखी की रक्षा करना,
यही रहा बाबा का काम॥
बाबा के चरणों में जाकर,
जो कहता मैं हूँ निर्धन।
दया उसी पर होती उनकी,
खुल जाते दुःख के बंधन॥
कभी किसी ने माँगी भिक्षा,
दो बाबा मुझको संतान।
“एवमस्तु” कहकर साईं,
देते थे उसको वरदान॥
स्वयं दुःखी बाबा हो जाते,
दीन-दुखीजन का लख हाल।
अंतःकरण श्री साईं का,
सागर जैसा रहा विशाल॥
भक्त एक मद्रासी आया,
घर का बहुत बड़ा धनवान।
माल-खजाना बेहद उसका,
केवल नहीं रही संतान॥
लगा मनाने साईंनाथ को,
बाबा मुझ पर दया करो।
झंझा से झंकृत नैया को,
तुम्हीं मेरी पार करो॥
कुलदीपक के बिना अंधेरा,
छाया हुआ घर में मेरे।
इसलिए आया हूँ बाबा,
होकर शरणागत तेरे॥
कुलदीपक के अभाव में,
व्यर्थ है दौलत की माया।
आज भिखारी बनकर बाबा,
शरण तुम्हारी मैं आया॥
दे दो मुझको पुत्र-दान,
मैं ऋणी रहूँगा जीवन भर।
और किसी की आशा न मुझको,
सिर्फ भरोसा है तुम पर॥
अनुनय-विनय बहुत की उसने,
चरणों में धर के शीश।
तब प्रसन्न होकर बाबा ने,
दिया भक्त को यह आशीष॥
“अल्ला भला करेगा तेरा”,
पुत्र जन्म हो तेरे घर।
कृपा रहेगी तुझ पर उसकी,
और तेरे उस बालक पर॥
अब तक नहीं किसी ने पाया,
साईं की कृपा का पार।
पुत्र-रत्न दे मद्रासी को,
धन्य किया उसका संसार॥
तन-मन से जो भजे उसी का,
जग में होता है उद्धार।
साँच को आँच नहीं कोई,
सदा झूठ की होती हार॥
मैं हूँ सदा सहारे उसके,
सदा रहूँगा उसका दास।
साईं जैसा प्रभु मिला है,
इतनी ही कम है क्या आस॥
मेरा भी दिन था एक ऐसा,
मिलती नहीं मुझे रोटी।
तन पर कपड़ा दूर रहा था,
शेष रही नन्हीं-सी लंगोटी॥
सरिता सन्मुख होने पर भी,
मैं प्यासा का प्यासा था।
दुर्दिन मेरा मेरे ऊपर,
दावाग्नि बरसाता था॥
धरती के अतिरिक्त जगत में,
मेरा कुछ अवलंब न था।
बना भिखारी मैं दुनिया में,
दर-दर ठोकर खाता था॥
ऐसे में एक मित्र मिला जो,
परम भक्त साईं का था।
जंजालों से मुक्त मगर,
जगत में वह भी मुझ-सा था॥
बाबा के दर्शन की खातिर,
मिल दोनों ने किया विचार।
साईं जैसे दयामूर्ति के,
दर्शन को हो गए तैयार॥
पावन शिरडी नगर में जाकर,
देख मतवाली मूरत।
धन्य जन्म हो गया कि हमने,
जब देखी साईं की सूरत॥
जब से किए हैं दर्शन हमने,
दुःख सारा काफूर हो गया।
संकट सारे मिटे और,
विपदाओं का अंत हो गया॥
मान और सम्मान मिला,
भिक्षा में हमको बाबा से।
प्रतिबिंबित हो उठे जगत में,
हम साईं की आभा से॥
बाबा ने सम्मान दिया है,
मान दिया इस जीवन में।
इसका ही संबल ले मैं,
हँसता जाऊँगा जीवन में॥
साईं की लीला का मेरे,
मन पर ऐसा असर हुआ।
लगता जगती के कण-कण में,
जैसे हो वह भरा हुआ॥
‘काशीराम’ बाबा का भक्त,
शिरडी में रहता था।
मैं साईं का, साईं मेरा,
वह दुनिया से कहता था॥
सीकर स्वयं वस्त्र बेचता,
ग्राम-नगर बाजारों में।
झंकृत उसकी हृदय-तंत्री थी,
साईं की झंकारों में॥
स्तब्ध निशा थी, थे सोए,
रजनी आँचल में चाँद-सितारे।
नहीं सूझता रहा हाथ को हाथ,
तिमिर के मारे॥
वस्त्र बेचकर लौट रहा था,
हाय! हाट से काशी।
विचित्र बड़ा संयोग कि उस दिन,
आता था एकाकी॥
घेर राह में खड़े हो गए,
उसे कुटिल अन्यायी।
मारो, काटो, लूटो इसकी—
यह ध्वनि पड़ी सुनाई॥
लूट-पीटकर उसे वहाँ से,
कुटिल गए चम्पत हो।
आघातों में मर्माहत हो,
उसने दी संज्ञा खो॥
बहुत देर तक पड़ा रहा वह,
वहीं उसी हालत में।
जाने कब कुछ होश हो उठा,
वहीं उसकी पलक में॥
अनजाने ही उसके मुँह से,
निकल पड़ा था साईं।
जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में,
बाबा को पड़ी सुनाई॥
क्षुब्ध हो उठा मानस उनका,
बाबा गए विकल हो।
लगता जैसे घटना सारी,
घटी उन्हीं के सम्मुख हो॥
उन्मादी से इधर-उधर तब,
बाबा लगे भटकने।
सम्मुख चीज़ें जो भी आईं,
उनको लगे पटकने॥
और धधकते अंगारों में,
बाबा ने अपना कर डाला।
हुए सशंकित सभी वहाँ,
लख तांडव-नृत्य निराला॥
समझ गए सब लोग कि कोई,
भक्त पड़ा संकट में।
क्षुभित खड़े थे सभी वहाँ,
पर पड़े हुए विस्मय में॥
उसे बचाने की ही खातिर,
बाबा आज विकल हैं।
उसकी ही पीड़ा से पीड़ित,
उनका अंतःस्थल है॥
इतने में ही विधि ने अपनी,
विचित्रता दिखलाई।
लख कर जिसको जनता की,
श्रद्धा-सरिता लहराई॥
लेकर संज्ञाहीन भक्त को,
गाड़ी एक वहाँ आई।
सम्मुख अपने देख भक्त को,
साईं की आँखें भर आईं॥
शांत, धीर, गंभीर, सिंधु-सा,
बाबा का अंतःस्थल।
आज न जाने क्यों रह-रहकर,
हो जाता था चंचल॥
आज दया की मूर्ति स्वयं था,
बना हुआ उपचारि।
और भक्त के लिए आज था,
देव बना प्रतिहारी॥
आज भक्त की विषम परीक्षा में,
सफल हुआ था काशी।
उसके ही दर्शन की खातिर,
उमड़े नगर-निवासी॥
जब भी और जहाँ भी कोई,
भक्त पड़े संकट में।
उसकी रक्षा करने बाबा,
आते हैं पल-भर में॥
युग-युग का है सत्य यह,
नहीं कोई नई कहानी।
आपद्ग्रस्त भक्त जब होता,
आते स्वयं अंतर्यामी॥
भेदभाव से परे पुजारी,
मानवता के थे साईं।
जितने प्यारे हिन्दू-मुस्लिम,
उतने ही थे सिख-ईसाई॥
भेद-भाव मंदिर-मस्जिद का,
तोड़-फोड़ बाबा ने डाला।
राह-रहीम सभी उनके थे,
कृष्ण-करिम अल्लाह-ताला॥
घंटे की प्रतिध्वनि से गूँजा,
मस्जिद का कोना-कोना।
मिले परस्पर हिन्दू-मुस्लिम,
प्यार बढ़ा दिन-दिन दूना॥
चमत्कार था कितना सुंदर,
परिचय इस काया ने दिया।
और नीम कड़वाहट में भी,
मिठास बाबा ने भर दिया॥
सबको स्नेह दिया साईं ने,
सबको संतुल प्यार किया।
जो कुछ जिसने भी चाहा,
बाबा ने उसको वही दिया॥
ऐसे स्नेहशील भजन का,
नाम सदा जो जपा करे।
पर्वत जैसा दुःख क्यों न हो,
पल-भर में वह दूर टरे॥
साईं जैसा दाता हमने,
अरे! नहीं देखा कोई।
जिसके केवल दर्शन से ही,
सारी विपदा दूर गई॥
तन में साईं, मन में साईं,
साईं-साईं भजा करो।
अपने तन की सुधि-बुधि खोकर,
सुधि उसकी तुम किया करो॥
जब तू अपनी सुधि तज,
बाबा की सुधि किया करेगा।
और रात-दिन बाबा-बाबा,
ही तू रटा करेगा॥
तो बाबा को अरे! विवश हो,
सुधि तेरी लेनी ही होगी।
तेरी हर इच्छा बाबा को,
पूरी ही करनी होगी॥
जंगल-जंगल भटक न पागल,
और ढूँढ़ने बाबा को।
एक जगह केवल शिरडी में,
तू पाएगा बाबा को॥
धन्य जगत में प्राणी है वह,
जिसने बाबा को पाया।
दुःख में, सुख में प्रहर आठों,
साईं का ही गुण गाया॥
गिरे संकटों के पर्वत,
चाहे बिजली ही टूट पड़े।
साईं का ले नाम सदा तुम,
सम्मुख सबके रहो अड़े॥
इस बूढ़े की सुन करामत,
तुम हो जाओगे हैरान।
दंग रह गए सुनकर जिसको,
जाने कितने चतुर-सुजान॥
एक बार शिरडी में साधु,
ढोंगी था कोई आया।
भोली-भाली नगर-निवासी,
जनता को था भरमाया॥
जड़ी-बूटियाँ उन्हें दिखाकर,
करने लगा वह भाषण।
कहने लगा—सुनो श्रोतागण,
घर मेरा है वृन्दावन॥
औषधि मेरे पास एक है,
और अजब इसमें शक्ति।
इसके सेवन करने से ही,
हो जाती दुःख से मुक्ति॥
अगर मुक्त होना चाहो तुम,
संकट से, बीमारी से।
तो है मेरा नम्र निवेदन,
हर नर से, हर नारी से॥
लो, खरीद तुम इसको,
इसकी सेवन-विधियाँ हैं न्यारी।
यद्यपि तुच्छ वस्तु है यह,
गुण उसके हैं अति भारी॥
जो है संतति-हीन यहाँ यदि,
मेरी औषधि को खाए।
पुत्र-रत्न हो प्राप्त,
अरे! वह मुँह-माँगा फल पाए॥
औषधि मेरी जो न खरीदे,
जीवन भर पछताएगा।
मुझ जैसा प्राणी शायद ही,
अरे! यहाँ आ पाएगा॥
दुनिया दो दिनों का मेला है,
मौज-शौक तुम भी कर लो।
अगर इससे मिलता है सब कुछ,
तुम भी इसको ले लो॥
हैरानी बढ़ती जनता की,
देख इसकी कारस्तानी।
प्रमुदित वह भी मन-ही-मन था,
देख लोगों की नादानी॥
खबर सुनाने बाबा को यह,
गया दौड़कर सेवक एक।
सुनकर भृकुटी तनी और,
विस्मरण हो गया सभी विवेक॥
हुक्म दिया सेवक को—
सत्वर पकड़ दुष्ट को लाओ।
या शिरडी की सीमा से,
कपटी को दूर भगाओ॥
मेरे रहते भोली-भाली,
शिरडी की जनता को।
कौन नीच ऐसा जो,
साहस करता है छलने को॥
पल-भर में ऐसे ढोंगी,
कपटी नीच लुटेरे को।
महानाश के महागर्त में,
पहुँचा दूँ जीवन भर को॥
तनिक मिला आभास मदारी,
क्रूर, कुटिल अन्यायी को।
काल नाचता है अब सिर पर,
गुस्सा आया साईं को॥
पल-भर में सब खेल बंद कर,
भागा सिर पर रखकर पैर।
सोच रहा था मन-ही-मन,
भगवान नहीं है अब खैर॥
सच है साईं जैसा दानी,
मिल न सकेगा जग में।
अंश ईश का साईं बाबा,
उन्हें न कुछ भी मुश्किल जग में॥
स्नेह, शील, सौजन्य आदि का,
आभूषण धारण कर।
बढ़ता इस दुनिया में जो भी,
मानव-सेवा के पथ पर॥
वही जीत लेता है जगत के,
जन-जन का अंतःस्थल।
उसकी एक उदासी ही,
जगत को कर देती है विहल॥
जब-जब जग में भार पाप का,
बढ़-बढ़ ही जाता है।
उसे मिटाने की ही खातिर,
अवतारी ही आता है॥
पाप और अन्याय सभी कुछ,
इस जगती का हर के।
दूर भगा देता दुनिया के,
दानव को क्षण भर के॥
ऐसे ही अवतारी साईं,
मृत्युलोक में आकर।
समता का यह पाठ पढ़ाया,
सबको अपना आप मिटाकर॥
नाम द्वारका मस्जिद का,
रखा शिरडी में साईं ने।
दाप, ताप, संताप मिटाया,
जो कुछ आया साईं ने॥
सदा याद में मस्त राम की,
बैठे रहते थे साईं।
पहर आठ ही राम-नाम को,
भजते रहते थे साईं॥
सूखी-रूखी, ताज़ी-बासी,
चाहे या होवे पकवान।
सौदा प्यार के भूखे साईं की,
ख़ातिर थे सभी समान॥
स्नेह और श्रद्धा से अपनी,
जन जो कुछ दे जाते थे।
बड़े चाव से उस भोजन को,
बाबा पावन करते थे॥
कभी-कभी मन बहलाने को,
बाबा बाग में जाते थे।
प्रमुदित मन में निरख प्रकृति,
आनंदित वे हो जाते थे॥
रंग-बिरंगे पुष्प बाग के,
मंद-मंद हिल-डुल करके।
बीहड़ वीराने मन में भी,
स्नेह-सलिल भर जाते थे॥
ऐसी सुमधुर बेला में भी,
दुःख, आपात, विपदा के मारे।
अपने मन की व्यथा सुनाने,
जन रहते बाबा को घेरे॥
सुनकर जिनकी करुण-कथा को,
नयन-कमल भर आते थे।
दे विभूति हर व्यथा, शांति,
उनके उर में भर देते थे॥
जाने क्या अद्भुत शक्ति,
उस विभूति में होती थी।
जो धारण करते मस्तक पर,
दुःख सारा हर लेती थी॥
धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन,
जो बाबा साईं के पाए।
धन्य कमल-कर उनके जिनसे,
चरण-कमल वे परसाए॥
काश निर्भय तुमको भी,
साक्षात् साईं मिल जाता।
वर्षों से उजड़ा चमन अपना,
फिर से आज खिल जाता॥
गर पकड़ता मैं चरण श्री के,
नहीं छोड़ता उम्रभर।
मना लेता मैं जरूर उनको,
गर रूठते साईं मुझ पर॥
॥ इति श्री साईं चालीसा समाप्त ॥
Regular recitation of Sai Baba Chalisa helps devotees attain peace of mind, patience, faith, and spiritual strength.
❓ FAQs – Sai Baba Chalisa
Q1. What is Sai Baba Chalisa?
Sai Baba Chalisa is a devotional hymn dedicated to Shirdi Sai Baba, recited for peace, faith, and spiritual strength.
Q2. When is the best time to recite Sai Baba Chalisa?
Sai Baba Chalisa can be recited daily, especially on Thursdays, during early morning hours, or with sincere devotion at any time.
Q3. Can Sai Baba Chalisa be recited daily?
Yes, daily recitation of Sai Baba Chalisa brings mental peace, patience, and positivity in life.
Q4. Is Sai Baba Chalisa available in Hindi and English?
Yes, Sai Baba Chalisa is available in both Hindi and English and can be recited in any language with devotion.
Q5. Who can recite Sai Baba Chalisa?
Anyone can recite Sai Baba Chalisa, regardless of age or background, with faith and a pure heart.



